जीविका स्वयं सहायता समूह: बिहार के गांवों में पानी की जहरीली चपेट में एक उम्मीद की किरण
"> बिहार के गांवों में जीविका दीदियों के प्रयासों का प्रतिनिधित्व करने वाला चित्रबिहार की ग्रामीण आबादी आज जहां एक तरफ सड़क, बिजली और पक्के मकानों का सपना देख रही है, वहीं दूसरी तरफ उसकी अपनी जमीन के नीचे का पानी धीरे-धीरे जहर बनता जा रहा है। हैंडपंप के हर घूंट में आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन जैसे खतरनाक तत्व घुल रहे हैं। इस गंभीर स्थिति में जब सरकारी फिल्टर कागजों में ही अटके नज़र आते हैं, तो जीविका (Jeevika) के स्वयं सहायता समूह की लाखों महिलाएं जल शुद्धिकरण की मुहिम को जमीनी स्तर पर नई ऊर्जा दे रही हैं।
बिहार का जल संकट — आंकड़े बताते हैं पूरी तस्वीर
हाल ही में बिहार आर्थिक सर्वेक्षण (2024-25) में खुलासा हुआ कि राज्य के करीब 26% ग्रामीण वार्डों (31 जिलों) में भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन की मात्रा अनुमति से कहीं अधिक है। आर्सेनिक 20 जिलों में मिल चुका है, जिसमें भागलपुर, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर और खगड़िया जैसे बड़े जिले शामिल हैं। वहीं फ्लोराइड का कहर मुख्यतः दक्षिणी बिहार के गया, नालंदा, जमुई में देखने को मिल रहा है। लोहे (Iron) की मात्रा तो 33 जिलों में मानक से ऊपर चली गई है।
▪ आर्सेनिक प्रभावित वार्ड — 4,709
▪ फ्लोराइड प्रभावित वार्ड — 3,789
▪ आयरन प्रभावित वार्ड — 21,709
▪ प्रदूषित हैंडपंपों पर लाल निशान — PHED ने पेंटिंग शुरू की है ताकि लोग उस पानी को पीने से बचें।
विशेषज्ञों के अनुसार, गंगा के मैदानी इलाकों में गहरे कुएं खोदने से यह समस्या गंभीर हो गई है। शोध में पाया गया कि सरकारी फिल्टर अक्सर गलत जगह लगा दिए जाते हैं, जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके छूट जाते हैं। जैसे पश्चिम चंपारण और सीतामढ़ी में आर्सेनिक का संकट गहराने के बावजूद वहां जरूरी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं। यहां जीविका जैसे समुदायिक संगठनों की भूमिका अहम हो जाती है क्योंकि ये गांव तक हर छोटी जानकारी पहुंचा सकते हैं।
जीविका (Jeevika) SHG का विशाल नेटवर्क — बदलाव का जरिया
बिहार ग्रामीण आजीविका संवर्धन सोसायटी (BRLPS), जिसे आम भाषा में ‘जीविका’ कहा जाता है, ने राज्य में दस लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों का सृजन किया है। इन समूहों से जुड़ी महिलाओं की संख्या 1.35 करोड़ के पार है। हर गांव में जीविका दीदियों की पैठ है, जो बैंकिंग से लेकर पोषण अभियान तक का काम करती हैं। पिछले कुछ सालों में इन समूहों के जरिए स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता पर काफी काम हुआ है। बिहार के भूजल में आर्सेनिक के प्रभाव पर लिखी गई रिपोर्ट में भी जीविका की जमीनी मौजूदगी को एक बड़ी ताकत माना गया है।
शुरू में ये समूह सिर्फ छोटी बचत और कर्ज के लिए बनाए गए थे, लेकिन अब जीविका ने नल जीवन मिशन के तहत पाइप जल योजनाओं के क्रियान्वयन में भी अपनी भूमिका तलाश ली है। कई जिलों में इन समूहों के जरिए ही ग्रामीणों को आरओ और बायोसैंड फिल्टर के बारे में बताया जा रहा है।
यह नेटवर्क इतना सघन है कि गांव के बैंक सखी से लेकर आशा बहू तक, हर स्तर पर जीविका दीदियां मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, हाइवे पर ढाबों की तरह ही गांवों में भी ये दीदियां अनौपचारिक सूचना केंद्र बन चुकी हैं, जहां बीमारी, पानी, स्वास्थ्य सबकी चर्चा होती है।
पानी शुद्धिकरण के घरेलू समाधान — जलकल्प मॉडल
गांवों के लिए बिना बिजली के चलने वाले किफायती फिल्टर की जरूरत को देखते हुए ‘जलकल्प’ (JalKalp) जैसे बायोसैंड फिल्टर विकसित किए गए हैं। यह स्टील के बने पोर्टेबल उपकरणों में रेत, बजरी और एक्टिवेटेड कार्बन की परतों के जरिए पानी छानता है। टेस्ट रिपोर्ट्स के अनुसार, जलकल्प 95% से 99% तक आर्सेनिक हटाने में सक्षम है। बक्सर जिले में इसने 1750 ppb आर्सेनिक लेवल को 10 ppb से भी कम कर दिया, जो पीने लायक है।
• कीमत — करीब ₹2,500, जो बाजार के आरओ से काफी कम है।
• बिना बिजली — ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण) से काम करता है, पानी खुद छनता है।
• आर्सेनिक + आयरन हटाना — लोहे की कीलों पर ऑक्सीकरण के जरिए आर्सेनिक सोख लेता है।
• बैक्टीरिया और टरबिडिटी — मिट्टी और कीटाणु भी छन जाते हैं।
• ज़ीरो मेंटेनेंस कॉस्ट — सिर्फ समय-समय पर सफाई की जरूरत।
लेकिन समस्या यह है कि गरीब परिवार के लिए अग्रिम भुगतान में ढाई हजार रुपये भी बड़ी राशि होती है। यहीं पर जीविका SHG के रिवाल्विंग फंड और छोटे ऋण संयोजन की भूमिका बनती है। जीविका समूहों के जरिए महिलाएं आपस में बचत कर सकती हैं और अपने घर के लिए एक साथ सस्ता फिल्टर खरीद सकती हैं।
गांवों में जल शुद्धिकरण को बढ़ावा देने में जीविका की भूमिका
जीविका केवल बचत और ऋण तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में जीविका टेक्निकल सपोर्ट प्रोग्राम (JTSP) के तहत स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता को SHG प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया है। AIIMS पटना और प्रोजेक्ट कंसर्न इंटरनेशनल ने मिलकर मिड-लेवल मैनेजर्स को स्वच्छता और संक्रमण रोकथाम का प्रशिक्षण दिया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य सिर्फ कर्ज दिलाना नहीं, बल्कि गांव के परिवारों की भलाई को सुनिश्चित करना है।
कई जिलों में जीविका दीदियां स्वयं जल जांच किट का उपयोग कर रही हैं। जैसे बेटी के जन्म पर पेड़ लगाने की जो परंपरा है, वैसे ही अब कुछ गांवों में बेटी के जन्म पर एक छोटा जल फिल्टर रखने की परंपरा शुरू हुई है। ये छोटे कदम ही बिहार के बड़े स्वास्थ्य संकट को धीरे-धीरे कम कर सकते हैं।
जब UPSC की तैयारी में लगा बिहार का युवा शहरों की ओर पलायन कर जाता है, तो गांव की महिलाएं अपने घरों में ही जल गुणवत्ता सुधारने का बीड़ा उठा रही हैं। जीविका समूहों की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे भरोसे का माहौल बनाते हैं। जब एक दीदी फिल्टर के फायदे बताती है, तो बाकी महिलाएं भी उसे अपनाने लगती हैं।
• सामुदायिक फिल्टर खरीद — सदस्य हर महीने 50-100 रुपये जमा करके एक फिल्टर खरीद सकती हैं।
• आर्सेनिक टेस्टिंग अभियान — प्रखंड स्तर पर जीविका संघ सस्ती टेस्टिंग किट के जरिए पानी की जांच कर सकते हैं।
• सरकारी योजना से तालमेल — PHED के फिल्टर लगाने के कार्य में मदद, खासकर जहां जीविका पहले से काम कर रही हो।
• महिला उद्यमिता — कुछ महिलाएं फिल्टर बनाने और बेचने का छोटा व्यवसाय शुरू कर सकती हैं।
निष्कर्ष — बदलाव की शुरुआत अपने घर से
सरकारी फिल्टर का गलत स्थान पर लगना और मेंटेनेंस में आ रही कमियों से यह साफ है कि तकनीक अकेले समस्या नहीं हल करेगी। जब तक ग्रामीण परिवार जागरूक नहीं होंगे, जब तक वे अपने हैंडपंप के पानी को लेकर सतर्क नहीं होंगे, तब तक स्वास्थ्य संकट जारी रहेगा। लेकिन जीविका जैसा जमीनी नेटवर्क बिहार के पास एक बड़ा मौका है। अगर राज्य सरकार, जीविका और जल विभाग मिलकर काम करें, तो 30,207 प्रदूषित वार्डों को साफ पानी देने की रफ्तार बढ़ सकती है। आखिर जब महिलाएं बचत और कर्ज को संभाल सकती हैं, तो अपने बच्चों के लिए साफ पानी का इंतजाम भी कर सकती हैं।

